સહકાર બદલ આભાર. તકલીફ બદલ ક્ષમા. , ઈર્ષાળુ ને આર્શીવાદ- આ. રવિદેવ સૂરિ

श्रुततीर्थ ऐटले शु?

जे क्षेत्रमां श्रुत/ज्ञान नो महिमा गाजतो राखवानी भावना पूज्यश्रीनी छे, तेथी श्रुततीर्थ नाम राखवामां आवयु. कारण के “ जिन आगम जिनबिंब भवियण कुं तारा ” आ पंकितने सार्थक करवा आ संकुल ज्ञाननी गंगा वहावता १४४४ ग्रंथो हस्त लेखित राखवमा आवशे तेमज पूज्यश्रीनी भावना छे के १४४४ जीवंत ग्रंथो पण निर्माण करवा ते माटे विधापीठ निर्माण करी छे.

कल्याण मंदिर जीनालय शा माटे?

भारतभरमां वर्तमानकाले २३ मा तीर्थकर श्री पाश्वॅनाथ परमात्मानो महिमा चारे तरफ खूब ज प्रसिद्ध छे परंतु अलोकिक प्रभाव युक्त श्री कल्याण मंदिर स्त्रोत विशे घणा लोको अज्ञान छे तेना महिमानो ख्याल आवे ते ध्यानमां लई कल्याणने करतुं कल्याण मंदिर जीनालय बनाव्युं जेवुं स्त्रोत तेवुं अलोकिक जीनालय बनेल छे. जोया पछी एक वार तो मुखमांथी वाह वाह सर्यो वगर रहेज नही.

कल्याण मंदिरनी रचना कोणे करी? शा माटे ?

श्री सिद्धसेनसूरीश्र्वरजी बार वर्ष सुधी अवधूत वेशमां अनेक देशोमां भ्रमण करी रहया हता, त्यारे तेमने सांभल्युं, ‘महाराजा विक्रमादित्य मिथ्यात्वनी जालमां फसाया छे.’ तेथी तेमने उपदेश आपवा मालवदेशमां आव्या.

राजाने बोध आपवाना उदेशथी तेओ उज्जयिनी नगरीमां आवेल महाकालना मंदिरमां गया अने अवधूत वेशमां ज लिंगनी सामे पोताना बे पग लंबावी सुई गया.

पुजारिए श्री सिद्धसेनसूरीश्र्वरजी ने आ प्रमाणे सूतेला जोया एटले तेणे कहयुं, ‘ऐ सूनारा ! अहिंथी उठी जा देवनी सामे आ प्रमाणे सुवुं न जोइऐ. ’

आ प्रमाणे वारंवार कहेवा छतां ते न उठया त्यारे पुजारिए राजा पासे जई फरियाद करतां कहयुं, ‘ हे राजन ! आजे एक अवधूत वेशधारी पुरुष मंदिरमां आव्यो छे, ते पोताना बे पग लिंग सामे लंबावी सूतो छे.’

राजाए आ सांभली पुजारीने कहयु, ‘जो तेने समजावी उठया कहेवा छतां न उठे तो चाबुक मारी त्यांथी काढ़ो.

राजाना कहेवा प्रमाणे करवा छतां श्री सिद्धसेनसूरीश्र्वर न उठया, त्यारे चाबुकनों मार मारवामां आव्यों. ऐटले आश्चर्य जेवुं तो ए बन्यु के ते चाबुकोनो मार अंत:पुरमां राणीओने वागवा लाग्यो.

आ वात अंत:पुरनी दासीओऐ आवी महाराजाने कही ऐ वात सांभलतां ज महाराज उतावले मंदिर तरफ चाल्याने मंदिरे आवी अवधूतने कहयुं, ‘तमे कल्याण अने मोक्ष आपनार शिवजीनी स्तुती करो, लोको देवोनी स्तुती करे छे, अनादर नहि.’

सुरीजीए कहयुं, ‘राजन! महादेव मारी स्तुति सहन करी शकशे नहि.’

राजाए कहयुं, ‘सहन केम नहि करे ? जरूर करशे। तमे महादेवनी स्तुति तो करो.’

सुरीजीए कहयुं, ‘मारी स्तुतिथी देवने कांई विध्न थाय तो मने दोष न आपशो.’

सुरीजीए राजाने आ प्रमाणे कहयुं, छतां राजाए स्तुतिने माटे आग्रह चालु रख्यों.

आखरे राजाना आग्रहने वश थई सुरीजीए अवधूत वेशमां उभा थई ‘बत्रिस द्रात्रिशिका’ थी एटले ३२ श्र्लोक वड़े महावीर भगवाननी स्तुति करी.

स्तुति करवा छतां महावीरस्वामी प्रगट नथी थता ते सुरीए जोयु। एटले पार्श्र्वनाथ प्रभुनी स्तुति करी. कल्याण मंदिर स्त्रोतथी ‘क्रोधस्त्वया’ वगेरे शब्दोथी गर्भित काव्य ज्यारे तेमने रच्युं त्यारे महाकालनुं लिंग धीरे-धीरे फाटवा लाग्यूं. ऐ फाटेला लिंगमांथी घुमाड़ो निकलवा लाग्यो.

थोड़ी ज वारमां ए फाटेला लिंगमांथी भगवान पार्श्र्वनाथनी प्रतिमा प्रगट थती देखाई.

श्री पार्श्र्वनाथनी प्रतिमा प्रगट थयेली जोई सिद्धसेनसुरीजी कहेवा लाग्या, ‘आ ज देव मारी अद्दभूत स्तुति सहन करी शके छे.’

राजाए पुछयुं, ‘हे भगवान ! तमे कोण छो ? अने आ प्रगट थयेला देव कोण छे?’

अवधूते कहयुं, ‘सूरियोमां अग्रण्य वृद्धवादिसूरीनो हुं सिद्धसेन नामनों शिष्य छुं. कोई कारणथी हु बाहर भ्रमण करवा निकल्यो छुं. अनेक देशोमां भ्रमण करतो हुं आज अहीं आव्यों छुं. हे राजन ! अत्यार पहेलां तमारी साथे मारी मुलाक़ात थई चुकी छे. ज्यारे हुं तमने पहेलां मल्यों त्यारे में आ श्र्लोक मोकल्यों हतो.

          भिक्षर्द्रीद्रूक्षुरायातस्तिष्टति द्रारि वारित: ।

          हस्तन्यस्तचतु: श्र्लोक : किं वाडगच्छतु गच्छतु ।।

आ तेमज बीजा चार श्र्लोको द्वारा राजसभामां तमारी साथे मारी मुलाकात थई हती। अने जे देव अत्यारे प्रत्यक्ष थया छे, ते देवेन्द्रो वडे पुजायेला श्री पार्श्र्वनाथ छे.

सूरिना आ शब्दोथी राजा आश्र्चर्य पाम्या ने पुछवा लाग्या, ‘आ महादेवना मंदिरमां सर्वज्ञ पार्श्र्वनाथ केवी रीते प्रगट थया?’

 

श्री अवंती पार्श्र्वनाथनो इतिहास

महाराजाने श्री सिद्धसेनदिवाकरसूरीश्र्वरजी कहेवा लाग्या, ‘हे राजन ! आ मंदिरनों पहेलांनों इतिहास तमे ध्यानपूर्वक सांभलो. पहेलां आ अवंतीमां एक घणा श्रीमंत तथा यशस्वी भद्र नामना शेठ रहेता हता. तेने शील वगेरे गुणोवाली भद्रा नामनी पत्नी हती, तेनो अवंतीसुकुमार नामनो पुत्र हतो, आ पुत्र स्वरूपमां देवो करतां पण वधु स्वरूपवान हतो.

अवंतीकुमारे आर्यसुहस्तिसूरीश्र्वरजी द्वारा नलिनीगुल्म विमाननुं वर्णन सांभल्युं. आ सांभल्या पछी ते विचारवश थयो. विचार करतां करतां तेने पोतनो पूर्वजन्म याद आव्यो.

पोतनो पूर्वजन्म जाणी ते सूरीश्र्वरजी पासे गयो अने पुछयुं, ‘शु तमे नलिनीगुल्म विमानमांथी अहीं आव्या छो?’

सुरीजीए कहयुं, ‘हु शास्त्रना बलथी ते विमाननी यथार्थ स्थिति जानुं छुं.’

भद्रापुत्रे कहयुं,  आप ऐ नलिनीगुल्मना सुखनुं वर्णन करो.‘ हुं तेना उत्कृष्ट सुख विना मारूं जीवन वृथा मानुं छुं. ते विमान हुं केवी रीते मेलवी शकुं ते आप मने कहो.’ सुरीजीऐ कहयुं, ‘नलिनीगुल्म विमाननी प्राप्ति दीक्षा लिधा सिवाय थई शके नहीं.’ भद्रपुत्रे कहयु, ‘तो गुरुदेव ! आप मने अत्यारे ज दीक्षा आपो.’

सुरीजिऐ कहयुं, ‘हुं तमने अत्यारे दीक्षा आपी शकतो नथी. तमे तमारा मातापिताने पूछी पछिथी दीक्षा ल्यों.’

भद्रापुत्रे आ प्रमाणे सुरीजी साथे वात कर्या पछी बहार बागमा जई पोतानी जाते ज दीक्षा लिधी. अने योगिनी जेम शरीरनो त्याग करवा माटे नलिनीगुल्म विमाननु ध्यान करतो ते त्यां ज स्मशानमां काउस्सग्ग ध्याने रहया.

ते ज्यारे आ प्रमाणे ध्यानमां लिन थई गयो हतो, ते वखते तेनी पूर्वजन्मनी स्त्री जे आ जन्ममां शियालनी जातीमां उत्पन्न थई हती, ते बच्चाओ साथे दैवयोगे त्यां आवी. ने ते क्रोधे थईने ऐ मुनि वेशधारी अवंती सुकुमारने जुदी जुदी जातना उपसर्ग करती त्रास आपवा लागी. ते शियालनी अने तेना बच्चाओऐ तेना शरीरना अवयवोने करडती ते खावा लागी. खूब दु:ख थवा छता ते मुनि भगवंत ध्यानमां स्थिर रहया.

भद्रापुत्रे शुभ ध्यान करतां ते रात्रे पोतना शरीरनो त्याग कर्यों अने निष्पाप थई नलिनीगुल्म विमानमां देव थयो.

सवारे भद्र शेठ जयां सुरीजी हता त्यां आव्या ने पोतना पुत्रना समाचार पूछी बहार स्मशानमां गया. त्यां पोतानो पुत्रनो शियालनीथी करडायेलो मरेलो कलेवर पडेलो जोयों. ने मनथी दु:खी थता बापे तेनो अग्निसंस्कार कर्यों. पछी ते सुरीजी पासे गया ऐटले सुरीजिए कहयुं, ‘तमारों पुत्र नलिनीगुल्म विमानमां देवरुपे उत्पन्न थयो छे.

सुरीजी द्वारा पोतना पुत्रना समाचार जणी शेठनों शोक शांत थयो. पछीथी तेमणे ते स्थानने घणु ज द्रव्य खर्ची श्री पार्श्र्वनाथजीनेश्र्वरनु घणु सुंदर चैत्य बनाव्युं. ने आ पृथ्वी पर महाकाल एवा नामे प्रसिद्ध थया. समय जतां अहीं ब्राह्मणोए शिवलिंग स्थापित कर्यु....

 

वीतराग प्रभुनुं स्वरूप

श्री सिद्धसेनदिवाकरसूरीश्र्वरनी आ प्रमाणेनी धर्मकथा सांभली राजाए मिथ्यात्वनो त्याग करी जैनधर्म पर श्रद्धावाला थई महाकालना मंदिरमां ज जीनेश्र्वर पाश्र्वनाथनी प्रतिमाने स्थापन करी, आदरपूर्वक पूजन कर्यु. पुजारिओने एक हजार गामोनुं दान कर्यु ने श्रावकोना बार व्रतोवालां सम्यकत्वनो स्वीकार कर्यों.

समय जतां एक दिवसे श्री सिद्धसेनदिवाकरसूरीश्र्वरजीए कहयुं, ‘ हे राजन ! लक्ष्मीनु दान करवुं ते सर्वोत्तम धर्म छे तेवुं जिनेश्र्वरोए कहयुं छे. दान करवाथी मुक्ति अने सुख, बन्ने मले छे. दान करवाथी दशे दिshaaशामां कीर्ति फेलाय छे। जेणे दान कर्यु नथी तेनुं जीवन पाणीनी जेम वृथा वही जाय छे. श्री ऋषभदेवे तेमना पूर्वजन्ममां-सार्थवाहना भवमां घणा घी वगेरेनुं दान कर्यु हतुं तेथी ते त्रैलोकयना पितामह थया.

जेओए जन्मातरोमां पुण्य कर्यु छे, जे बधा प्राणीओ पर दया करनार छे, गरीबोने दान आपनार छे, तेओ तीर्थकर अने चक्रवर्तीनी ऋद्धि अने संपत्तिना स्वामी श्री शांतिनाथ प्रभु थया छे.

मर्या पछी बीजाओथी जे दान करवामां आव्युं होय छे, तेनु फल मरनारने मले तेनो निर्णय थई शकतो नथी. परंतु जे दान पोताना हाथथी अपाय छे ते जरूर फल आपे छे. तेमां शंका नथी. कहेवायुं छे, दान देवानी घननों नाश थाय छे तेवुं विचारवुं जोइए नहीं, परंतु कूवो, आराम, गाय आ बधानो दानमां उपयोग न करे तो संपत्तिनो नाश थाय छे.

सुपात्रने दान आपवाथी धर्मनी प्राप्ति थाय छे. सामान्य मनुष्यने दान आपवानी दयालुतानी प्राप्ति थाय छे. मित्रोने दान आपवाथी प्रेमनी वृद्धि थाय छे. शत्रुने दान आपवानी वैरभावना नाश पामे छे. सेवकने दान आपावाथी ते वधारे सेवा करे छे. राजाने दान आपवाथी यश मले छे. आ प्रमाणे दिधेलुं दान क्यारे पण निष्फल जतुं नथी.

श्री जिनेश्र्वरदेव वर्ष सुधी रोज याचकोने इच्छा प्रमाणे सोनुं, चांदी वगेरेनुं दान आपे छे, आम पृथ्वीने ऋणरहित करी पछी दीक्षा ले छे ने धीरे धीरे आठे कर्मनो नाश करी मुक्ति मेलवे छे. कहयुं छे, जे लक्ष्मी पोतानी जाते ज पेदा करी होय ते कन्या-पुत्री जेवी छे. बापे लक्ष्मी पेदाकरी वारसामां आपी होय ते बहेन जेवी छे. जो बीजाथी प्राप्त थाय तोते परस्त्री जेवी छे. तेथी लक्ष्मीनो त्याग करवानी जेमनामां भावना छे ते ज बुद्धिवालो मनुष्य छे.

दान, शील, तप, भाव आ चार प्रकारना धर्मने पालनार मानव मुक्ति अने सूखने मेलवे छे.

 

कलशाकारे जिनालय

जैनधर्ममां ज्योतिष विधानो पण स्वीकार करवामां आव्यो छे. अनेक महान जैनचार्योंए ग्रहो – नक्षत्रोनी गति-स्थिति विगेरेनो उंड़ाणभार्यों अभ्यास करी आगवुं संशोधन करेल छे अने ज्योतिष शास्त्र विशे अभ्यास पूर्ण मननीय ग्रंथोनी रचनाओ पण करेल छे.

जैनधर्मना अत्यंत पवित्र गणाता ग्रंथाधीराज ‘कल्पसूत्र’ शास्त्रमां भगवान महावीरना जीवननुं  विस्तृत वर्णन आचार्य भद्रबाहु स्वामीए करेलुं छे. तेमां भगवान महावीरना जन्म,दीक्षा केवलज्ञान विगेरे पांचेय कल्याणकना समये आकाशमां ग्रहोनी शुं स्थिति हती, क्या क्या ग्रहो केवा केवा उच्च स्थानमां रहेला हता विगेरे विगतोनुं विस्तृत वर्णन करेलुं छे.

जीनालयोनी प्रतिष्ठा, सिद्वचक्र महापूजन विगेरे अनेक विधिओमां पण नवग्रहनुं पूजन करवामां आवे छे. आम अति प्राचीनकालथी जैन परंपरामां शुभाशुभ ग्रहोनी अने तेना प्रभावोनी मान्यतानो स्वीकार करवामां आव्यो छे. ते ते ग्रहोनो प्रभाव व्यक्तिनी शारीरिक अने मानसिक क्षमताओने क्यारेक हकारात्मक तो क्यारेक नकारात्मक स्वरुपे असर करे छे. अने पछी तेनो प्रभाव जीवन ऊपर पण पड़े छे.

जैनधर्मना शास्त्रग्रंथोमां आवता उल्लेखो प्रमाणे दरेक ग्रह कोइने कोई तीर्थकर परमात्मा प्रत्ये विशेष भक्ति अने संबंध धरावे छे. एटले ते ते तीर्थकर प्रभुनी पूजा उपासना करीने पछी जे ते ग्रहना जप विगेरे करवा जोइए.

श्रुततीर्थ मध्ये, ज्योतिषाचार्य, श्री घंटाकर्णवीर एवम श्री अंबिका देवी उपासक प.पू.आ. श्री रविदेव सूरी म.सा. नी प्रेरणाथी जैन शास्त्रानुसार नवग्रह अने नवग्रह पूजित श्री नव परमात्मा नुं जीनालय भव्य कलशाकारे संगीतरत्न श्री अनिल गेमावत परिवारे मातुश्री विमलादेवी आनंदराजाजी गेमावत ना नामे निर्माण करेल छे.कलश जिन मंदिर अदभूत जोवालायक ने आत्मशांति माटेनुं एक केन्द्र बनेल छे. तेमज पालिताणा महातीर्थ ना नाक समान कलशजिन मंदिर......                

 

श्रुततीर्थ मध्ये हरिभद्रसूरी स्मारक

जिन आगम जिन बिंब भवियण कुं तारा हस्तलेखित ज्ञानयज्ञ

पार न पामी शकाय तेवा अगाध संसार सागरमांथी तरवा माटे भवि आत्माने माटे बे ज स्टीमर महान छे.

  1. जिनागम/जिनवानी 2) जिनप्रतिमा

परमात्मा दीक्षा अंगीकार करी साधना द्वारा अघातिकर्मनो नाश करी केवलज्ञाननी प्राप्ति करे छे, केवलज्ञाननी प्राप्ति बाद सवी जीव करूं शासन रसी नी भावना सार्थक करवा विचरण करता धर्मोपदेश एतले के जिनवानी संभलावे छे अने गणधर भगवंतो तेने द्धादशांगी रूपी रचना करी जीवो समक्ष मुके छे.

आजथी बारसो वर्ष पूर्वे सुरिपुरंदर श्री हरिभद्र सुरीश्र्वरजी म.सा. एक अद्वितीय महापुरुष थया तेमना ज्ञाननो सर्वजीवो ने लाभ थाय ते हेतु गुरुज्ञान ए तेमने स्वयंभूत १४४४ ग्रंथनी रचना करी वर्तमान जैनशासन ने भेटधरी. ते महापुरुषनुं यत्किचिंत ऋण अदा करवा तेमनी प्रत्ये भक्तिथी तेमना नामनुं स्मारक बनाववानों निर्णय मनमां स्फुर्यों. भक्तो ने आ विचार दर्शावता तेमना तरफथी सुंदर सहकार प्राप्त थयो तेवी ज रीते अनेक पूज्य गुरुभगवंतो तरफथी आशीर्वाद ना अमी प्राप्त थता “पूज्यपाद श्री हरिभद्रसुरि स्मारक” पालिताnaaणानी पवित्र भूमिमां प्रवेशता पूर्वे श्रुततीर्थ ना नामे संकुल निर्माण थयुं. टुंक समयमां सारी प्रगति ए महापुरुष नी कृपा अने वडिलोना अंतरना आशिष ...

स्मारक ऐटले खाली मकान नहीं पण तेमा प्रवेशतां ज ज्ञाननो वारसो याद आवी जय ने ज्ञाननी परंपरा जलवाई रहे ते हेतुथी बे विचार मनमां स्फुर्यों ...

  1. पुजयपादश्री हरिभद्र सुरीश्र्वरजी म.सा.नुं जेटलुं पण साहित्य होय तेटलुं आ स्मारकमा संकलित करवुं अने शकय एटला ग्रंथो हस्त लेखितमां कंडारवा...
  2. ग्रंथो भंडारमां के कबाटमांज सुरक्षित राखवा पड़े अने तेम करिए तो देशदेशांतरमां तेनो प्रचार थाय

नहीं ऐटले हस्तलेखित ग्रंथोनी साथे जीवंत ग्रंथो निर्माण करवा श्रुततीर्थ संकुलमां “सुरीपुरंदर विध्यापीठ” नी स्थापना करी तेमां पण अनाथ बालकोने प्रथम आश्रय आपी संस्कार वारसो अने सम्यगज्ञान वारसो आपवनों निर्णय करेल छे.

अमारा ट्रस्टनो उदेश ज्ञान सरंक्षण अने ज्ञान प्रचार मुख्य रहेल छे, अमे कोइ पक्षपाती वलण न धरावता निष्पक्ष जीवन जीववा इच्छीए छिए. आप सर्वने निवेदन छे आ कार्यमां आपने योग्य लागे ते सुचन जनाववा तेमज एकवार संकुलमां पधारी निरीक्षण करी योग्य मार्गदर्शन आपशो. आफ्ना योग्य मार्गदर्शनने समजी अमलमां मुकवा अवश्य प्रयत्न करशु सहकार बदल आभार ...

आ कार्यने वधु वेग आपवा आर्थिकनी आवश्यकता रहेवानी ज छे पण तमारी पुण्यवंती लक्ष्मीनो सद्व्यय हेतु नानकdiडी शी योजनाओ छे तेमां पण योग्य सहकार नी अपेक्षा ...

संप्रति महाराजाए सवालाख जिनमंदिर अने सवा करोड जीनप्रतिमा भरावेल छे ते माटे रोज एक जीनालयनी शीला मुक्ता तेम आपश्री पण रोजनो एक श्र्लोक लखावो. एक श्र्लोक रू/.५ मां लखाय छे.

१ श्र्लोक = रू/.५ , ३० श्र्लोक = रू/.१५० , ३६५ श्र्लोक = रू/.१८२५/- घरना दरेक मेम्बर आ योजनामां जोड़ाई शके तेनाथी ज्ञानावरणीय कर्म तुटे मतलब घातीकर्म तुटे, घातीकर्म तुटया पछी अघाती तुटे आपोआप ने मले मुक्तिपुरीमां वास, ज्यां छे शाश्र्वत सुख ...

विशेष मां आ योजनामां जोडीववानी इच्छा होय तो दर महीने अमारा ज्ञानयज्ञना कर्मठ कार्यकरो तमने सहकार-साथ आपशे.

ज्ञाननी महीमा समजाई होय, ज्ञान सरंक्षणमां सहकार आपवानी भावना होय , जीनागम ने जिन बिंब जेटलुं ज महत्व आपता हो तो , सेवाभावी कर्मठ कार्यकरनो संपर्क साधवा नम्र विनंती ...

विशेषमां तमे दर वर्षे तमारा योगदान ने निहाली शकशो, कारण के वर्षमां एकवार तो पालिताणा महातीर्थ ना दर्शनाथे तो भाग्यशालीओ जता ज होय छे.

बस, धनना सदुपयोग माटे जोडाओ ज्ञानयज्ञमां, ने तोडो ज्ञानावरनीय कर्मो ..... घाती कर्मो....

 

प्रतिष्ठा महोत्सवनी मंगलक्षण         

प्रतिष्ठानी घडीनो आनंद घणाने छे कारण के “श्रेयांशि बहु विध्नानि” पण आ तीर्थ निर्माणमां कोइ पण विध्न आवेल नथी, हा... विध्नना वादलो चढ़ीने आवे परंतु वरसे ते पूर्व ज तेनो विलय थई जाय. ते माटे गुरुजी वारंवार कहे छे क्षेत्रनो प्रभाव. आ पुण्यवंती पवित्र बनेल भूमि छे. अनेक वार देवताओ दैविक सुखो त्याग करीने आ भूमिनी स्पर्शनाए आव्या छे.

श्री आदिनाथ परमात्मानी देशना सांभलवा अनेकवार समवसरणनी रचना करी छे. पुंडरीक स्वामी आदि अनेक महात्माओ अनशन करी आत्मानुभूतिनी ऊर्जा छोडेल छे तेवी महत्ताने पामेल भूमिमां, विध्नना वादलों केम वर्षी शके ?

पू. सुरीपुरंदर श्री हरिभद्रसूरी स्मारकना नामथी उपाश्रय निर्माण करवों तेवी भावनाथी बीज रोपानुं पूज्यश्रीनी जीनालय निर्माणनी कोइ वात हती नहि पण जुदो ज कंईक संकेत हशे तेथी जग्यामां फसाया ने निकल्या अने सं.२०६४ना नवसारी चातुर्मासमां श्री कल्याण मंदिर जीनालय निर्माणनी विचारणा करी श्री पर्युषण महापर्वना प्रथम दिने श्री संघ समक्ष वात मुकी ने सिद्धक्षेत्र भूमिना प्रतापे, वडिलोना आशीर्वादे अने पूज्यश्रीनी सरलताए बे दिवसमां ९०% योजना पूर्ण थई.६५/६६ नुं चातुर्मास कारणोवशात साउथमां जवानुं थतां कार्य प्रारंभ न कर्यु.

सं.२०६७ महा सुद १४ ना रोज भूमिपूजन पूज्यश्रीना संसारी काका सौ.मुक्ताबेन रमणीकलाल वाडीलाल वालानी परिवारना हस्ते करवामां आवेल.

सं.२०६७ वैशाख सुद – ३ ना रोज कलश जिन मंदिर शिलास्थापना करवामां आवी अने जिनमंदिरनुं निर्माण कार्य चालू थयुं. सोमपुरा बाबुभाईने सोमपुरा राजुभाईनो उत्साह सारो हतो अने पूज्यश्रीने कहेल आपे जे मुदत आपी तेना एक मास पूर्व आपने जीनालय बनावी अर्पण करशु… वाह केवो छे गुरुदेवनी भावनानों पड़घो..

सं. २०६८ का.सु. १५ फेब्रुआरी – २०१२ ना रोज सवारे शुभ मुहुर्ते श्री कल्याण मंदिर जीनालय निर्माण हेतु ६३ शीला स्थापन महोत्सवनुं भव्य आयोजन थयेल अनेक साधु/साध्वीजी भगवंतोनी निश्रामां विधिकारक श्री अरविंदभाई इंचलकरंजी ना विधिविधानोथी थयेल. जोतजोतामां ११ मासने ७ दिवसमां संपूर्ण जीनालय पूर्णताने पाम्युं. जेमां ४६ देरी + ३ महाप्रसाद निर्माण करवामां आवेल.

मूर्तिओ, जीनालय अने टुंक समय जोता नजर लागी जाय अथवा ईर्ष्यानुं कारण बने तेवुं कार्य थयुं...

आचार्य पद- प्रतिष्ठा महोत्सव प्रसंगे पधरामणी पूज्य             गुरुदेवोनी

    प.पू.आ.श्री सुरेन्द्र-राम-अभयदेवसूरी शिशु

     प.पू.नूतन आचार्यश्री रविदेव सुरीश्वरजी म.सा

     प.पू.युवामुनिराजश्री प्रियरत्न वि.म.सा [पद्माकर]

     प.पू.मुनिराजश्री आगमप्रिय वि.म.सा[आनंदराज]

          प्रसंगने शोभाववा निश्रापदान करी प.पू.आ.श्री पूण्योंदय सागर सूरी.म.सा, विमलगच्छाधिपति प.पू.आ.श्री प्रधूम्नविमलसूरी.म.सा, डहेलावाला समुदायना प.पू.आ.श्री जयनंdद सूरी.म.सा, लब्धिसूरी समुदायना प.पू.प्रवर्तक कलापूर्ण वि.म.सा.तपागच्छना गादिपति यतिवर्य विजयसोमजी म.सा. आदि मुनिवृंद

                        तथा

डहेलावाला समुदायना सा.श्री मौलिकरत्ना श्रीजी म.सा.ना शिष्या सा.श्री दिव्यज्योति श्रीजी म.सा.ना शिष्या मातृवत्सला सा.श्री जिनरूचि श्रीजी म.सा., सा.श्री योगरूचि श्रीजी म.सा, पू.भक्तिसूरी समुदायना सा.भावपूर्णा श्रीजी म.सा.परिवार , पू. ॐकारसूरी समुदायना सा.महाप्रज्ञा श्रीजी म.सा, सा. दिव्यप्रज्ञा श्रीजी म.सा, सा.श्री हर्षकांता श्रीजी म.सा. पाश्र्वॅचंद्रगच्छना सा.विपुलगिरा श्रीजी म.सा. आ तीर्थना विशेष सहयोगी पू.धर्मसूरी समुदायना सा.मुत्युंjyaज्या श्रीजी म.सा., सा.पुण्ययशा श्रीजी म.सा. मयूरयशा श्रीजी आदिश्रमणीवृंद

प्रतिष्ठानी पलो नजीक आवती गई, हैयां हेले चडयां, पूज्यश्रीने जेटलो आनंद हतो तेथी वधु आनंद ट्रस्टना ट्रस्टीवर्य श्री प्रग्नेशभाई, राजुभाईने जीतुभाईना हदयमां समतो न हतो अने प्रसंगने चार चांद लागे ते माटे मगजने पग दोडता थई गया हता. तेमां श्री जसवंतभाई वालानीनो सहकार मल्यो...

 

वचनसिद्धिनो अनुभव

पूज्यश्रीए संगीतरत्न अनिल गेमावतने प्रतिष्ठा माटे जनावेल तो कहे मारी तारीख बुकिंग थई गएल छे. पूज्यश्री ए कहयुं मारे कोइने कहेवानुं नथी तमारे ज आववानुं छे ने आववुं पड़शे. ने पूज्यश्रीना वचनने साचु पाडवा मुंबईमां नक्की थयेल अंजनशलाका संजोगोवशात मूलतवी रही अने पूज्यश्रीनी अंजनशलाकामां हाजरी आपी एटलुं ज नहीं पूज्यश्रीनी प्रथम अंजनशलाका– पदवी – प्रतिष्ठा महामहोत्सवमां जोरदार रंग जमावी दीधों.. पालिताणामां वर्षे २/३ अंजनशलाकाओ थती होय छतां पण श्रुततिर्थनी प्रतिष्ठा लोकोना होठे ने हैये चढ़ी. वाह वाह शु टुंका समयमां जीनालय बनाव्युं छे ने केवी तो व्यवस्था गोठवी छे. लाभार्थीओ आ प्रसंगने जोई गुरुदेवने वारंवार प्रशंसा ना फूलोथी वधाववा जतां गुरुदेव कहे में कशुं ज नथी कर्यु बधु ज परिणाम तमारा भावोनु छे. तमारी प्रेरणाथी, न सोमपुरानी महेनतथी, न तमारा द्रव्यथी आ ऐतिहासिक तीर्थ निर्माण पामेल छे. आ तीर्थ निर्माणमां भावो महत्वना अने दैविक शक्तिना सहयोगथी श्रुततीर्थ बन्यु छे.सिद्धोनी पवित्रभूमिनो प्रताप अने इच्छापुरण क्षेत्रपाल महाराजानी हरपले जागृति ऐ आ कार्य करेल छे.

पथरा नांखनारने पण गुरुदेवे धन्यवाद आपेल छे अने कहयुं छे तमे पथरो नांखों तो पण अमारा सोपान(सीडी) मां काम आवशे. गुरुदेवनो पहेलो सिद्धांत- कोइनी लिटी भुंसी आपनी लिटी मोटी न करवी, उपकारीनो उपकार भुलवो नहि, गुणीना गुण गाया विना रहेवुं नहि.

शुद्ध विधिविधानमां बेंग्लोरथी पधारेल तुषार गुरुजीऐ सुंदर सहकार आपेल तेमनी टीम खुब ज क्रियामां उत्सुक हती, खावा-पीवानु भूली क्रियामां मस्त हता तेवो ज सहकार मुंबईथी पधारेlल स्वयं सेवको समयने जोया विना महेनत करी प्रसंगने दीपाव्यों छे.

आचार्य पद प्रदान...

पूज्यश्रीनी सामे एक प्रश्न उभों थयो प्रतिष्ठा कोण करावे ? अंजन कोण करे ? पूज्यश्री शास्त्रज्ञाता, आगम अभ्यासी होवाना कारणे जवाब आपेल महानिशीथ योगोद्धहन करेल महात्माने अंजल करवानो अधिकार छे. प्रतिष्ठा तो कोई पण मुनि पण करावे. लाभार्थी परिवारमांथी वात आवी के अंजन तो आचार्य भगवंत ज करे. तमे आचार्य पदवी ग्रहण करो, गुरुदेवे घनी ज ना कही छतां पण आचार्य पदवीनों आग्रह रखायो त्यारे समुदाय / गुरुदेवनी आज्ञा लेवी जरूरी हती परंतु गुरुदेवनी साथे वडील तरफथी अपमानजनक वर्तनना कारणे गुरुदेवे ता.२-४-२०१२ ना रोज पत्र लखी समुदायमांथी मुक्ति मेलवी लिधी हती. तेथी वादिलोनी आज्ञा मंगावानो प्रश्न आवतों ज न हतो. तेमज गणीपदवी माटे योगोद्धहननी जरूर बाकी आचार्य पदवी माटे कोई योगोद्धहन आवता नथी आ वातने पुष्ट करवा अन्य ५/१० आचार्य भगवंतोनी सलाह लई आचार्य पदवी माटे संमति आपेल ने विद्धान आचार्य भगवंत पुण्योंदयसागरसूरीश्र्वरजी महाराजा ना हस्ते आचार्य पद ग्रहण करेल. खुब ज शानदार पदवी महोत्सव उजवायो ने ते ज रात्रे पूज्यश्रीना हस्तकमलो द्वारा ६३ जिनबिंबोने अंजन करवामां आवेल.

 

प्रतिष्ठा...

शुभ घड़ी शुभ वेलाए लाभार्थी परिवारों द्धारा गगनभेदी नाद साथे मंत्रोच्चार पूर्वक, संगीतना सुरोमां जुमता, भव्य भावोल्लास साथे ५६ परमात्माने गादिनशीन करवामां आवेल. वि.सं.२०७०, पोष सुद -१५, ता.१६-०१-२०१४ गुरुवार ना शुभ मुहूर्ते लब्धिनिधान श्री गौतमस्वामी, श्री हरिभद्र सूरी, तथा सिध्धसेन दिवाकर सूरी भगवंतनी प्रतिष्ठा थयेल.

वि.सं.२०७१, पोष-वद-१३, ता.१८-०१-२०१५ रविवारना शुभमुहूर्ते नवग्रह इंद्र महाराज नी भावोल्लास साथे प्रतिष्ठा तेमज मुमुक्षु शैलेशकुमार (वय ६|| वर्ष) नी भागवती प्रवजया.

दीक्षानुं नाम लघुबाल मुनिराजश्री आचारांगप्रिय वि.म.सा राखवामां आवेल...

वि.सं.२०७२, पोष-सुद-१५, ता.२३-०१-२०१६ शनिवार ना शुभमुहूर्ते सुरतनिवासी श्री वसुमतीबेन चंद्रकांत पानाचंद जवेरी जैन भोजनशाला तथा रवेलनिवासी मातुश्री ताराबेन नटवरलाल वालाणी सूरीपुरंदर विध्यापीठ नुं उद्घाट्न चतुविॅदा संघ तथा वर्तमान राज्यमान्य नेताओनी हाजरीमां आवेल...

              श्रुततीर्थ संकुल मां अन्य निर्माणाघिन .....

  1.   श्रीअजितनाथ पेठी- वापी निर्मित

     प.पू.आ.रविदेवसूरी आराधना भवन

  1.   स्व.मातुश्री रतनदेवी बाबूलालजी क्षत्रियवोरा

     अनाथशिशु मंदिर [मिलियन ग्रुप - दिल्ली]