સહકાર બદલ આભાર. તકલીફ બદલ ક્ષમા. , ઈર્ષાળુ ને આર્શીવાદ- આ. રવિદેવ સૂરિ

 रवि जीवन करो मनन

      सुखदायक सहुने सदा, गरवा गुण गंभीर उपकारी गुरु रविराज, कर्या महा उपकार. १

     सहपरिवार लही दीक्षाने, सफल कर्यो अवतार, ग्रंथ रच्या बहू ज्ञानना,     भविजनने हितकार. २

     अमृतवाणी आपनी, गंभीर गुण भरपूर, शास्त्रबोध आपी घणा,सुधार्या,     नरनार. ३

     तप जप कथण कर्या घणा, अभिग्रहो ऊरधार, समतारसमां श्रेष्ठ छो, छो   सदगुण भंडार. ४

     पंचमहाव्रत पालता, पालता पंचाचार, शास्त्रभेद संपन्न छो, छो उत्तम     अणगार. ५

     सुखकर तुम दर्शन सदा, दु:खहर तुम देदार, उपसर्ग सहन करी, कर्यो आत्मा    उद्धार. ६

     सदवर्तन सदवाणी छे, वली सदविचार, गुणगाउं हुं केटला, गण्या न आवे पार. ७

     शिष्य आपना उच्चरे, आगमप्रिय धरी प्यार, श्री गुरु सविराजने, नमुं नमुं सुखकार. ८

  • मुनि आगमप्रिय वि.म.[आनंदराज]

 

      नानी उंमरे बधी ज वाते पूरो, कई वाते, न पुछशो ?

     मुख्य वात चोरी – जूठ, जेनी पासे जूठ तेने कई कहेवानी जरूर नथी.

          एक समयनी वात छे,

              ने मारा जीवननी भात छे,

                   तेमां गुरुदेवनो साथ छे.

     सं.२०२८ नी घटना

      बपोरनो समय, सूर्य मध्याहे तपी रह्यो छे, त्यारे मारा रसने पोसवा एक पुस्तकने वांचवा बेठो... पुस्तकना नाममां के लेखकमां कई रस नहीं, बस वांचवुं मारो शोख, गमे ते होय.

     पुस्तक हाथमां लई १०/१२ गांदलाnनी थप्पी ऊपर चढ़ी बेठो,मने खबर नहीं आ गादलांनी थप्पी व्याख्याननी पाटे बेसाडशे. पण ज्यां गुरुकृपा मली त्यां व्याख्याननी पाट तो शुं ? समवसरणमां बेसावानी तक के देशना आपवानी तक दूर नथी होत. आ ताकात छे गुरुकृपामां,

     आवा मारा गुरुदेव पू. आ. श्री राजेन्द्रसूरीश्र्वरजी म.सा.

     पुस्तकनां पानां फरतां गया, ह्रदय हिबका भरवा लाग्युं. क्यारे न बन्युं तेवुं बनी गयुं. पुस्तको नानी उंमरे पण घणा वांच्या परंतु आ पुस्तके तो कमाल करी, मारा दिलने हचमचवी मुकयुं, ने आंखमांथी श्रावण-भादरवानों वरसाद शरू थयो.

      पानां फरे छे,

          दिल रडे छे,

              आंखमांथी आंsसुं टपके छे...

                        ने गुरुदेव पधारे छे..........

     परंतु गुरुदेव तो ज्ञानी, समजदार त्यांथी चूपचाप चाल्या गया मने खबर पण न पड़ी के म.सा. मने जोई गया. जो के हुं अनेक अवगुणोथी भरेलो, संत समागमथी दूर रहेनारो, नास्तिकोमा शिरोमणि, मारे ने महाराज साहेबने शुं ?

     पण आजनो दिवस मारा माटे सोनेरी तक लइने आवेलो, पुस्तक रूपी पारसे लोठारूपी मां सोनु बनावा प्रयत्न आदर्यो, तेमां गुरुदेवे करेलो चमत्कार... ए कोई जादूगर न हता, हता माणसने पारखनारा महाज़वेरी.

     गुरुदेव रूममां जई आसने बेसी एक छोकराने पुछयुं, मोटाहॉलमां गादलां ऊपर बेठेलो कोण छोकरो छे जोई आव, बोलावतो नहीं... ए छोकराए कहयुं रवेल नो राजेश.

     गुरुदेवे शॉर्टमां मारी माहिती तेनी पासेथी मेलवी लीधी... तेने रजा आपी... पू.राजशेखर वि.म.सा.(हाल आचार्य) ने मने बोलाववा मोकल्या... आंखमां आंसु ने पूज्यश्रीने मारी सामे जोतांएक क्षण माटे आश्चर्यमां पडयो... त्यां तो पुजयश्रीए कहयुं मोटा गुरुदेव बोलावे छे त्यां बीजु आश्चर्य... शुंवाट छे मने हुं तो कोई साधुने ओलखतो नथी, मने शा माटे बोलावे छे. दलील कर्या विना पुज्यश्रीनी साथे गयो.वंदन करतां आवडे नही तेथी हाथ जोड़ी उभो रह्यो बेस राजेश.(आ त्रिजुं आश्चर्य) भगवान वमहावीरे इन्द्रभूतिना अहंकारना चुरेचुरा कर्या प्रथम मुलाक़ाते तेम आ पू.आ.राजेन्द्रसुरी म.सा. नास्तिकमांथी आस्तिक, मिथ्याद्रष्टीमांथी सम्यगद्रष्टी ने शेतानमांथी सज्जन बनी शकुं ते माटे गुरुदेवे आकर्षण जमाव्युं. मारी माहिती ना आधारे संबोधतां गुरुदेवने हुं महानज्ञानी, जाणकार मानवा लाग्यो... त्यां तो प्रश्न थयो हमणां केम रडतो हतो? (आ चोथुं आश्चर्य) में विचार्यु आ महापुरुष जोड़े कई छुपाववा जेवुं नथी तेथी रडता  हृदये पुस्तक वांचता थयेल पश्चाताप, लागेल भयनुं वर्णन कर्यु... तो गुरुदेवे कहयुं तने खबर छे ए पुस्तक कोने लख्युं छे ते पुस्तकनुं शुं नाम छे? में कहयुं ना... त्यारे गुरुदेवे आश्चर्यनी परंपरामां उमेरो कर्यो ने कहयु ते पुस्तकनुं नाम “धार तलावारनी” अने में लख्युं छे. बस, पछी तो जोइए शुं (जे पुस्तकना शब्दोमां मने हलावी नंखवानी ताकात छे ते गुरुदेवनो हाथ पकड़ावाथी मने क्यां पहोंचाडी दे छे) तरत ज जीवन गुरुदेवने समर्पण करवा मस्तक पगमां जुकी गयुं... बाकी रहेलो अश्रुनो प्रवाह धोधमार जाने बारे मेध तुटी पड़े तेम तुटी पडयो.

     अश्रुना प्रवाहे अने गुरुदेवना वात्सल्य भर्या हाथे पीठ पर स्पर्श करी शेतान रूपी लोढ़ा जेवा मने सज्जन बनाववा पारसमणीनु काम कर्युं... बस ते दिवसथी गुरुदेवनी पासे दोडी जवा लाग्यो.... पण मारा कमनशीबे मने गुरुदेवे न स्वीकार्या.(मारा पीतश्रीना अंतराये, गुरुदेवना कहेवाथी मने मोकली दिधो महेसाणा पाठशालामां)

     त्यां रही अध्ययन साथे साथे गुरुदेवनुं निरंतर स्मरण करतो दिवसो-वरसो पसार करी संसारमां रखड़ी रह्यो... भटकी रह्यो... परंतु गुरुदेवे वावेलुं बीज प्रगटयुं ने जाग्यो वैराग्य...

     ४२ वर्षनी उंमरे संसारनी माया संकेली गुरुदेवे बतावेला मार्गे प्रयाण करवा तैयार थयो ने अंगीकार कर्यो संयम मार्ग.

     ५ वर्ष संयम गालामां पूर्ण थता हतां त्यां समाचार मल्या गुरुदेवने एकसीडन्ट थयो. एक क्षणने माटे हचमची गयो परंतु बीजी ज क्षणे अंतरात्मानो रणकार थयो. चिंता ना करीश तारा गुरुदेवने कई नही थाय समेतशिखरनो संघ अने प्रतिष्ठा तेमना हाथे ज थशे. बधुं ज कार्य संपूर्ण परिपूर्ण थयुं.

     आवा गुरुदेवे मारा जीवननी अंदर पारसमणीनुं काम कर्युं छे. महाजवेरी बनी.... ते गुरुदेवना चरणोमां शत शत वंदना........

                 - गच्छाधिपति पू.आ. अभयदेवसुरीशिशु पं. श्री रविरत्न वि.                                             

गुरुदेवना सपरिवार भ. महावीरे पंथे चालनार, अनेक जीवोने

परमात्मानो मार्ग बतावनार, सरल स्वभावी, कर्म, धर्म, मर्म  

अने प्रेम चारे शब्दोने आत्मसात करनार पू.पं.श्री रविरत्न वि.म.नी मुलाक़ातनी 

      

आछेरी जलक

  • संसारी नाम: राजेशकुमार नटवारलाल वालणी
  • जन्म: सं.२०१८ महा सुद १३/१७-०२-१९६२ ना बपोरे ताराबेननी कुक्षीएथी. रवेल गाममां
  • संसारी परिवार: बे भाई, बे बहेन, एक मासी, बे फइबा, चार काका, बे पुत्रो, एक पुत्री
  • परिवारमां दीक्षीत: पत्नी, पुत्री, पुत्रो, बे पितराई बहेनो, अने एक भत्रीजी.
  • संसार त्याग: सं.२०५९ चैत्र वद -५ नवसारी मुकामे पू.आ.श्री अभयदेवसुरी म.ना चरणोमां
  • व्यवसाय क्षेत्र: पालनपुर, जिजूवाडा, मुंबई, उम्मेदपुर, पाटण, थराद, सतलासणा, अमदावाद... धार्मिक अध्यापन, वेपार, विधिविधान, ज्योतिष अने पत्रकारित्व....
  • धर्म प्रचार क्षेत्र: गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, एम.पी., ए.पी, कर्णाटक, दिल्ली, कच्छ
  • तीर्थयात्रा: कल्याणक सर्व भूमि... (अष्टापद सिवाय)
  • तमे करेल विशिष्ट तपश्चर्या: अठ्ठाईतप वर्धमान तप ओलियां, श्रेणीतप, अभिग्रह  अठ्म, वर्षीतप, छूटक छूटक ५०० आयंबिल, लगातार एकासणां, बियासणां.
  • तमे करेल अभ्यास: व्य. गुजराती छ पास, चार प्रकरण, त्रणभाष्य, छ कर्मग्रंथ, तत्वार्थ पंचसंग्रह, बृहत्संग्रहणी, क्षेत्रसमास, प्रशमरति, आगमीक ग्रंथो, अनुयोगद्वार आदि संस्कृत प्रथमा- मध्यमा, काव्यो, प्राकृत पाठमाला, बालबोध ज्योतिषसार, ज्योतिष विशारद, बायोकेमिक विशेषज्ञ, भ्रमर ज्योतिष, तंत्र- मंत्र ना अनेक ग्रंथो, सर्व प्रकारना विधी-विधानो,
  • तमारा जीवनना उपकारी: आर्यकुलना संस्कार अर्पण करनारा: मातापिता, धर्मनुं बीज रोपनार.पू.आ. राजेन्द्रसुरी म.(कलिकुंड) सम्यगज्ञान अर्पण... श्रीमद् यशोविजय जैन पाठशाला, वैराग्य प्रदीप्त करनार... पू.आ. लब्धि- शांतिचंद्रसुरी म., साहित्यक्षेत्रे उत्साह वधारनार पू.आ. भद्रसेनसुरी म. आंतरिक गुणो वधारनार... पू.आ.ह्रीकारसूरी म. प्रसंगे प्रसंगे सहायक.... पू. आ. रत्नाकरसूरी म.पू.पं.. व्रजसेन वि. गणी. सम्यग चारित्र अर्पण... पू. आ. अभयदेवसुरी म.
  • मुख्य शोख: वांचन, आध्यात्मिक, राजकीय अने कथा साहित्य, संगीत ठंडु सांभलवानी.
  • प्रिय साहित्यिक कृतिओ: गुजराती भाषा जाणतो होवाथी पू.आ. भद्रगुप्तसूरीश्र्वरजी म.सा. लेखित, मो.चु. धामी लेखित अने गुणवंत शाह लेखित कृतिओ, आध्यात्मिकतामां वधारो करनार पू.आ. यशोविजयसूरी कृतिओ. जीवन परिवर्तन करनार कृति पू.आ. राजेन्द्रसूरी म. लेखित “धार तलवारनी” जीवनमां वैराग्य प्रदीप्त करनार पू.आ. रामचन्द्रसूरी म.सा. ना रामायण प्रवचनोनो प्रथम भाग “रामायण”
  • मनगमती फिल्मो: गुजराती फिल्म अने मारघाड़, वकीलात जेवी.
  • मन पसंद वानगी: दरेक प्रकारनी गुजराती वानगीओ भावे. खास करिने थेपला, मुठिया, उंधियु अने दालढोकली गुजराती मन पसंद..
  • मनगमतुं परफयुम: शोख नथी.
  • प्रिय प्रवास स्थल: गामडां गमे..
  • विकएन्ड कई रीते विताववो गमे: मारा माटे विकएन्ड जेवुं नथी होतुं. बधाज दिवसो सरखा.
  • प्रेम एटले शुं?: निर्मल स्नेह, एकबीजा प्रत्ये नि:sस्वार्थभावे समर्पण
  • तमने केवा जीवनसाथी गमे?: लागणीशील, निखालस, अने उत्साही.
  • तमारा माटे सौथी मूल्यवान शुं छे?: गुरुकृपा, मित्रोनो प्रेम , मारी दीकरी नेहा, वैरागी मारा पुत्रो...
  • कोई व्यसन?: खराब कोई व्यसन नथी, सामे सुगंधिदार मुखवास खावो बहु गमे, पण सारूं व्यसन कहो तो वांचवु गमे अने तेमांथी टांकण करवुं गमे...
  • लोकोनी कई बाबत तमने नथी गमती?: जूठ...दंभ.. कोइने छेतरता जोउं तो मने खूब ज दु:ख थाय... तेना पर तांत्रिक प्रयोग करवानुं मन पण थई जाय परंतु तांत्रिक प्रयोग करवो गमतो नथी (तांत्रिक प्रयोगो जाणुं छुं)
  • तमारो कोई आदर्श अने आदर्श व्यक्ति?: मारो आदर्श निखालस बनो, दाक्षीण्यता गुण धरावो.मारी आदर्श व्यक्ति पू.कीर्तिचंद्रसुरी म. अने मारे नानी मा.
  • तमने केवा थवु गमे?: हुं बनी शकतो होउ तो पं. व्रजसेन वि.म. जेवो बनु अथवा आ.यशोविजयसुरी जेवो बनुं.
  • जिंदगीमां कोई खेद?: हा... हुं घणी व्यक्तिनो ईर्ष्यानो भोग बन्यो छुं.केम ते हुं समजी शकयो नथी.छतांपण मारी जिंदगी मारूं  जीवन मने गमे छे खूब ज अंदरथी आनंद अनुभवुं छुं.
  • पुनर्जन्म केवो पसंद करो छो?: जन्म मलवो कर्माधीन छे. जे प्रमाणे कर्मसाहित्यनो अभ्यास अने महापुरुषोना जीवन चरित्रो पढ़तां तो एवुं लागे छे के मारी सदगति जणाती नथी छ्तां पण कहुं छुं नरक के तिर्यच गति मले तो पण स्वीकार्य छे फकत साथे मलवुं जोइए जलहलतुं शुध्ध सम्यकत्व.
  • तमारा जीवननो यादगार प्रसंगो?: घणुं लांबु लिस्ट छे छतां पण मुख्य प्रसंगो मां (१) शंखलपुरमां प्रवेश करतां थयेली पूर्व भव स्मृति (२) जीवनमां प्रथम मुलाक़ात पू.आ. राजेन्द्रसुरी म.सा.नी (३) महेसाणामां वर्धमान तपना पायानो प्रसंग (४) चांगा गाममां चानो सदंतर त्याग अने ठेबरीयो संघ (५)  पिताश्रीनी अंतिम क्षणो (६) धूलियानो सामूहिक तप. (७) जिंजुवाड़ानो समयगालो (८) बालपुरनो शताब्दी महोत्सव (९) विरारनी शिबीर.
  • तमारी साहित्य कृतिओ: वावणी करीलो-मालड, पुण्यनी चावि-कुर्ला, शिक्षणनी साची दिशा- भिवंडी, स्वाध्याय संहिता- कृष्णनगर, पद्मावती-मणीभद्र पूजन-पालिताणा. मंगलाचरण- धूलिया. सुनो मेरे परमात्मा- धूलिया. तारे ते तीर्थ-धूलिया. गुणवैभव-कांदिवली. मृत्यु महायात्रा-विरार.जिनराज प्रियपदार्थ-विरार.रवियोग प्रश्नमंच-नवसारी. उदयसोम अष्टाहिका- नवसारी.जिनराज प्रश्नमंच-गांधीनगर. हदय प्रदीप- नगरपेठ. अध्यात्म रवि पच्चीशी-सिकंदराबाद.रवीकथा हरिव्यथा-विरार. पाठशाला विशेषांक-कृष्णनगर.
  • तमारी काव्य कृतिओ: वर्तमान चोविशीना चैत्यवंदन-स्तवन-स्तुति. अध्यात्म पच्चीशी. वैराग्य तारा किरणो.
  • तमारा जीवननुं विशेष आकर्षक: रजनिभाई देवडी निर्मित गिरिराज अभिषेक. जिंजूवाडामां सामूहिक मासक्षमण.
  • गौरव लेवा जेवी तमारा जीवननी घटना: दशाश्रीमाली (कांकरेज) समाजमां तेमज वालानी कुटुंबमां सपरिवार प्रथम दीक्षा लेवानुं गौरव मने प्राप्त थयुं.
  • तेमज वालनी कुटुंबनो वावन पेठीनो वडलो बनाववानुं गौरव पण मने मल्युं.
  • डहेलावाला समुदायमां सह कुंटुंब दीक्षा लेनार प्रथम.

-- इंटरव्यूं  

सा.योगरुची श्रीजी म.

 

रवि जीवन कवन

            -युवामुनि प्रियरत्न वि.म.[पद्माकर]

आपनुं जीवन गुलाबनी सुवास,

सौना हैयामां करी गई वास;

नाना मोटाने याद आवो खास,

   पदमा कहे तमारामां वीरनो वास.

“पुष्पो” ने हती तमारी आश,

दिनेश” ना हृदये तमारो वास

वसंत” नुं हैयुं करे तपास,

अभय” आराधनामां तमे थया पास.

राजेशनुं ऊंचा देवलोकेथी थयुं जाने अवतरण,

भावना भावे छे जन्मीने करूं जन्मनुं मरण;

मानवभव लइने जल्दी ग्रहु धर्मनुं शरण,

उत्तम ज्ञानना बले करूं विषयोनुं वमन.     

महा सुद तेरस थयुं राजेशनुं आवागमन,

आत्म आराधनाए हवे बंध करूं गमनागमन;

पूर्वना योगभष्ट आत्माने गम्या प्रभुना वचन,

संसार भावोनु राजेशे कर्यु उत्तम शमन.

रवेल बनासकांठामां जन्मी राजेश,

उत्तम संस्कारोए बचपनथी धर्म तरफ;

कुशाग्रबुध्धिए बन्यो पाठशालामां मास्टर

संसारमां न लपेटाता गुण विकसाववा.

राजेशनी आकृति ज गुणान् कथयती,

बचपनथी तेजस्वी ललाटे दीपती;

सौम्यता सरलता सहृदयताए शोभाती,

उत्तम निखालसता निर्दोषता फेलावती.

युवान वये वैराग्य रंगोथी छलकातां,

   सादाईने स्वच्छतामां सदा रंगे शोभतां;

उघाड़ा पगे छतां उत्तम भावोथी जलकतां,

 पापभीरुताए अशुभकर्म बंधनथी अचकाता. 

राजेशे योवान वये प्रबल पुरुषार्थे संसारने मारी लात,

   सर्व समर्पण भावे हवे करवी छे घातीनी घात,

भली जवुं छे उत्तम भावे सिध्धोनी नात,

   ते माटे हवे करवी छे एक आत्मानी वात.

अभय गुरुना हैये हर्ष अपार,

राजेशने दीक्षा देवा काज,

मुहूर्ते पण काठ्युं गुरु हाथ,

 वालानी परिवारे दिधो साथ.

अभय गुरुए खिमतथी विहार कर्यो दीक्षा आपवा काज,

   राजेशने हवे जल्दी सजवा हता वीतराग प्रभुनां संयमना साज,

जेम्स इंटेरनेशनल नवसारी परिवारे दिधो साथ गुरुने,

  प्रशांतमूर्ति अभयदेव सुरीश्र्वरे दीधा उत्तम दीक्षाना दान.

राजेशे करी गुरु मैयानी खोज,

   महेंकी उठी संयम जीवननी लोज,

हराववी छे राजेशने कर्मनी फोज,

   राजेशने माणवी छे उत्तम भावनी मोज.

ज्योतिष विशारद आदि मौलिक ग्रंथोनु उंडु परिशीलन,

अन्य सहवर्ती साथे प्रेम वात्सल्य सौहार्दपूर्ण मिलन,

समयनो बगाड़ नही उपयोगनी वात ए ज ज्ञानीनु जीवन,

  आगमना बले, आत्मना बले जीवन बनाव्युं नंदनवन.

अरिहंत आगमोनु सचोट सत्य प्रकाशन करतां व्याख्यानो,

व्यवहार निश्चयना समन्वय सहितना अदभूत् द्रष्टांतो,

हार्ट टू हार्ट पहोंचे तेवा हृदय भेदी उत्तम वचनो,

   मीठी मधुरी शैली दरेकना हृदयमां उत्पन्न करे स्पंदनो.

खुदने खुदमां खोई नांखवानी रहेती खेवना,

 दर्द सामे लड़ी लेवानी अजब हती खुमारी,

प्रगटावी गुरुकृपाए अपूर्व आत्मिक मीरी,

   कर्मोनी खाना खराबी हटावी, प्रगटावी आत्मिक अमीरी.

साधना एमनी सहकार परिवारनो, आराधना एमनी संगाथ परिवारनो.

पात्रता एमनी पीठबल परिवारनु, द्रष्टाभाव एमनो उत्साह परिवारनो.

होठों पे सदा रहेती मुस्कान, हृदय में मैत्री भावकागान,

सबको दिया संयम का दान, राजेशने बनाया हरियाला परिवार,

तपोमूर्ति जयश्रीबेने दिधो साथ, नेहा-प्रीतेषे कर्या जीवन अर्पित,

सहुने संयम साधक बनावी तृप्त, प्रकाश फेलावी रवि थयो मस्त.